Friday, August 21, 2009

मेरे दो चम्मच वाली मैगी...


मेरे दो चम्मच वाली मैगी...
मैं मैगी का कोई बहुत बड़ा भक्त नहीं हूँ... और सच कहूं तो तीन साल पहले तक मुझे इसके स्वाद का कोई अंदाज़ा भी नहीं था. लेकिन कुछ तीन साल पहले मैं घर से निकला... इस दुनिया की भीड़ में अपने अस्तित्व की खोज में, और सच कहूं तो ये मैगी ने बड़ा साथ दिया...
पहली बार जब मैं एक दूसरे बड़े शहर में अकेला रहने आया, तो खान-पान का कोई ठिकाना नहीं होता था. सुबह-सुबह कॉलेज के लिए निकल जाते. शाम को जब लौटकर आते तो भूख के मारे जान निकल रही होती थी और अक्सरहां घर पर खाने का कुछ नहीं होता. ज्यादातर ऐसे मौकों पर मैं चाय बनाता और एक सिगरेट पी लेता.

ऐसे ही एक दिन, जब भूख बर्दाश्त नहीं हो रही थी, मैंने पहली बार मैगी बनाने की कोशिश की...सच बताऊँ तो बड़ी गन्दी बनी थी, फिर भी खा कर काफी तृप्ति हुई...

मैगी से मेरा असली तार्रुफ़ तब हुआ जब मैं दक्षिण भारत के एक शहर में नौकरी कर रहा था. वहाँ सबसे बड़ी परेशानी खाने की होती थी. फिर मुझे पता चला कि सोना को भी मैगी बड़ी पसंद है. (सोना का परिचय इसके पहले वाले ब्लॉग में देखें) तो भैया इस तरह हमें मैगी बनाने कि प्रेरणा मिली. सच बताऊँ, ठीक-ठाक बना लेता था, लेकिन सोना को बड़ी पसंद थी मेरे हाथों कि मैगी... अब तो आलम ऐसा है कि उसके बिना मैगी खाने का दिल ही नहीं होता.

हुआ यों कि एक बार वो छुट्टियों पर अपने घर गयी हुई थी. इत्तेफाकन उस दिन मेरी भी छुट्टी थी और मैं घर पर था. दोपहर में काफी गर्मी होने लगी थी सो खाना लाने बाहर नहीं गया. लेकिन भूख तो लग रही थी. तो हमने फिर उसदिन मैगी बनायी. आदतन प्लेट में मैगी निकाल कर मैं खाने बैठा.

अचानक मेरा ध्यान प्लेट पर गया, मैंने देखा मैं दो चम्मच ले आया हूँ. फिर मैंने सोचा, ऐसा क्यों. जवाब मिला कि मुझे सोना कि इतनी आदत हो गयी है कि मैगी अकेले खाऊँगा ये सोचा ही नहीं. उस दिन भी, एक चम्मच सोना की और दूसरी मेरी. एक चम्मच मैं उसे खिलाता और दूसरा ख़ुद खाता. अनायास ही इस बात का मुझे आभास हुआ कि शायद अब कभी भी मैं मैगी अकेले नहीं खा पाऊँगा...

ये थी मेरे दो चम्मच वाली मैगी...