Tuesday, September 8, 2009

adieu...

To all the people who have ever visited "with malice" ("with malice" has got some 40-odd viewers in the past month-and-a-half), I would like to convey my gratitude. I am really thankful to the ones who commented and also to the one who just went through. "with malice" was a very beautiful part of my life...
But as they say, all good things have to come to an end, and though I am sorry to say that "with malice" has come to a premature and abrupt end, I am happy with the support it got...
"with malice" will never come again.
Thank you all again for the love and support...
cheers...

Monday, September 7, 2009

i celebrated teacher's day


कुछ एक बरस हो गए मैं दिल्ली आया. इस बीच काम-धाम में समय कैसे निकल जाता है, पता ही नहीं चलता. ऐसा कि, एक कारण जो मेरे दिल्ली लौटने का रहा, उससे भी मुलाक़ात नहीं हो पायी थी अब तक.

फिर अचानक इस शनिवार, जब मैं घर पर बैठा बोर हो रहा था, ख़्याल आया कि दिल्ली में पुस्तक मेला लगा हुआ है. हालाँकि मैं पुस्तकों का बहुत बड़ा प्रेमी हूँ ऐसी कोई बात नहीं, फिर भी अच्चा साहित्य पढने में अभिरुचि हमेशा से रही है. तो चल पड़ा मैं पुस्तक मेला देखने.

लेकिन मेरी अपेक्षाओं के ठीक विपरीत, पुस्तक मेला बिलकुल ही नीरस निकला. वही किताबें जो आप हर दुकान पर मिल जाती हैं, और उन दुकानों से कुछ महंगी, वहां मिल रही थीं. मुझे निराशा हुई. सबसे ज्यादा निराशा मुझे वाणी और साहित्य अकादेमी के स्टाल्स पर हुई जहाँ कि कुछ भी नया नहीं मिला.

कुछ निराश और थका हुआ मैं पुस्तक मेले से बाहर निकल आया. ढलती शाम के लम्बे होते साए मेरे मन को कुछ ज्यादा ही दुखी कर रहे थे. प्रगति मैदान के सात नंबर गेट पर बैठा मैं सोच रहा था आगे क्या करुँ.

फिर एक फ़ोन आया. कुछ देर मैंने बातें कीं. मन कुछ हल्का हुआ. मुझे सलाह दी गयी के मैं पुरानी दिल्ली चला जाऊं. मैंने ऑटो बुलाया और बिना कुछ सोचे उसे जमा मस्जिद चलने को कहा.



विकास मार्ग से दरियागंज जाते हुए जैसे-जैसे रास्ते तंग होते गए, मेरे मन में एक अनजानी खुशी प्रस्फुटित होने लगी. ऑटोवाले ने मुझे मीना बाज़ार के बाहर उतारा. मैंने तय किया की पहले जामा मस्जिद देखी जाय. मीना बाज़ार के फुटपाथ पर लगे दुकानों के बीच से होता हुआ मैं मस्जिद की सीढियां चढ़ने लगा. जब चप्पल उतारने की बात आई तो मैं संकोच में पड़ गया.

कुछ सोचकर मैं फ़िर जामा मस्जिद के बाहर सीढियों पर बैठ गया. पीछे-से काज़ी ने मग़रिब की अज़ान लगायी. अहा! क्या एहसास था. ऐसा लग रहा था मनो मेरा मन उस अज़ान के साथ उड़ चला हो, और ऊपर वाले से तार्रुफ़ करके वापस मेरे पास आ गया. असीम शांति मिली वहां पर मुझे. चारों तरफ रोजेदारों की भीड़ में मुझे जितना सुकूँ मिला वैसा तो हर रोज़ नहीं मिलता. थोडी देर मैंने आस-पास की भीड़ को देखा. अल्लाह पर भरोसा रखने वाली एक अमनपसंद क़ौम से मेरा तार्रुफ़ हुआ. क्यूँ लड़ते हैं हम एक दूसरे से, जब ऐसी भईचारगी से रह सकते हैं हम सब?

ख़ैर, इस लम्हे को जेहन में क़ैद करके मैं निकला जामा मस्जिद की संकरी गलियों में... कुछ तलाश थी मुझे... मेरी नमाज़ जैसे अधूरी थी अभी भी...

एक दोस्त ने सही कहा: "तू जो सर-ब-सजदा कभी हुआ, तो ज़मीं से आने लगी सदा...
तेरा दिल तो है सनम आशनां, तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में..."

क्या तलाश थी मुझे... क्या ढूंढ रहा था मैं? चलते-चलते जब पैरों ने जवाब दे दिया तो मेंसे सोचा आगे का अनजान सफ़र एक रिक्शे पर तय किया जाय. जावेद (बातों-बातों में मैंने अपने रिक्शे वाले का नाम जाना) मानो मेरा नाखुदा बनके आया हो. हम दोनों को ही नहीं पता था मुझे कहाँ जाना है.

फिर जैसे ही वो बल्लीमारान की तरफ मुड़ा, मेरे कानों में कुछ गूंजने लगा हो जैसे. एक-एक अशआर दिमाग में तैरने लगे.
"बल्लीमारान के मोहल्लों की वो पेचीदा दलीलों की-सी गलियाँ
सामने टाल के नुक्कड़ पे, बटेरों के क़सीदे
गुडगुडाती हुई पान की पीकों में वह दाद, वह वाह-वाह
चंद दरवाजों पे लटके हुए बोसीदा-से कुछ टाट के परदे
एक बकरी के मेमियाने की आवाज़
और धुंधलाई हुई शाम के बेनूर अँधेरे
ऐसे दीवारों से मुह जोड़ के चलते हैं यहाँ
चूडीवालान के कतरे की ' बड़ी बी' जैसे
अपनी बुझती हुई आँखों से दरवाज़े टटोले
इसी बेनूर अँधेरी-सी 'गली क़ासिम' से
एक तरतीब चरागों की शुरू होती है
एक क़ुरान-ए-सुख़न का सफ़ा खुलता है
'असद उल्लाह खां ग़ालिब' का पता मिलता है"




...और सचमुच मेरी आँखों के सामने क़ुरान-ए-सुख़न का वो सफ़ा खुला. हवेली ग़ालिब मेरे सामने खडी थी. मुझे देख मुस्कुरा रही थी जैसे मालूम हो उसको कि मैं आऊंगा एक दिन. धुंधलाई सी शाम के उस बेनूर अँधेरे में एक चिराग़ शायद अन्दर हवेली में जल रहा होगा, जहाँ ग़ालिब बैठ कर लफ्जों को अपनी आवाज़ में पिरोते थे. और एक चिराग़ मेरे मन में रोशन हुआ. उस शाम को नया मानी मिला हो जैसे.

दिल ने कहा: " तुम्हारे सामने सजदा किया तो यूँ समझे,
नमाज़ कहते हैं जिसको वो अब अदा की है..."

लेकिन क्योंकि शाम गहरी हो चली थी, सो मुझे भी वहां से निकलना पड़ा...

एक हूक़ सी उठी मन में: "ये न थी हमारी क़िस्मत, कि विसाल-ए-यार होता..."
पता नहीं ग़ालिब की हवेली के दीवार पर ये अशआर किसने और क्यूँ लिख छोड़े होंगे...

गली क़ासिम जान से निकलते वक़्त मेरा दिल बड़ा हल्का मालूम पड़ रहा था. मैंने जावेद को खा चांदनी चौक ले चलो. उसने वैसा ही किया. बल्लीमारान से चावड़ी बाज़ार और वहां से चांदनी चौक... मानो पूरी दिल्ली यहीं सिमट आई थी. अहा! क्या नज़ारा था. वहां से लाल किला होते हुए मैं वापस जामा मस्जिद पहुंचा. ऊपर वाले का शुक्रिया अदा करना था. ईशा की नमाज़ का वक़्त हो रहा था. मैंने जावेद को रुख़सत किया और फिर एक बार अज़ान से वादी गूँज उठी. मैंने ऊपर वाले का शुक्रिया अदा किया.

फिर करीम रेस्तरां की ओर बढ़ चला.. वहां से खाना खाकर जब मैं वापस ऑटो पर बैठा तो कुछ ख्याल आ रहे थे दिमाग में. मैं शुक्रिया कर रहा था जावेद को, जिसकी वजह से ये सफ़र मुमकिन हुआ. ऊपर वाले का, जिसने मुझे शिक्षक दिवस पर अपने सबसे बड़े गुरु से मिलने का मौक़ा दिया... और एक शख्स जिसकी वजह से मैं उस रोज़ पुरानी दिल्ली गया.

ये कमाल था उस फोन कॉल का. उस शख्स का मेरी ज़िन्दगी पर ये क़र्ज़ रहेगा हमेशा...

आखिरी बात जो सोची वो ये थी: "हुई मुद्दत के मर गया ग़ालिब,
पर याद आता है वो हर एक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता!"