रात नाराज़ थी तुम मुझसे...मैं काम ही कुछ ऐसे करता हूँ... दो दिनों से हमारी बात भी नहीं हुई ठीक से... पर क्या बदला? हर सांस मैं तुम्हे महसूस करता हूँ... हर सुबह साढ़े मौ बजने का इंतज़ार करता हूँ कि उँगलियाँ फिर दौड़े फ़ोन पर... फिर एक आवाज़ आये उधर से--हेलो... फिर एक दिन जी जाऊं मैं...
दिन भर कि थकान के बाद रात जब बात हो तो लगे... पूरे दिन का मेहनताना मिल गया हो जैसे...
सोच रहा था कैसे बधाई दूं तुम्हे...कोई बेहतर तरीका नज़र नहीं आया...
ये कुछ अशार सिर्फ तुम्हारे लिए...
कैसे लिखूं इसपर कविता
इसी सोच में रात बीती जा रही है
मेरे जीवन के मुक्तक को संगीत मिला है तुमसे
सूरज की पहली किरने तुम्हारे 'हेलो' से घुसती हैं घर में
धुंधलाती हुई रात के बेनूर अँधेरे तुम्हारी आवाज़ से रौशनी पाते हैं
सुबह की गुड मोर्निंग से लेकर रात के गुड नाईट तक
हर छंद एमिन तुम्हारी मुस्कराहट गूंजती है
मेरे अस्तित्व को नई पहचान मिली है तुमसे
हो सके तो बस इनता करना
होठों पर ये मुस्कराहट हमेशा बरक़रार रखना
खुदा करे तेरी ज़िन्दगी में खुशियों की बहार आये
ढेर सारी उपलब्धियां लिए
तुम्हार जीवन में ये जन्मदिन बार-बार आये
